मसूरी गोलीकाण्ड 2 सितम्बर 1994 का भयाभय मंजर, आँखों देखा हाल
मसूरी । उत्तराखंड राज्य निर्माण शहादत की 31 वीं वर्षगाँठ और गनतंत्र पर देखें विशेष वीडियो –
उत्तराखण्ड राज्य निर्माण की मांग को लेकर 2 सितम्बर 1994 का दिन । वह दिन कुछ अलग ही था । ऐसा लग रहा था कि सूरज भी उस दिन पहले से अधिक लाल उगा था । तब मेरी उम्र 23 साल थी । मौत से दो दो हाथ करने का गुस्से से भरा लावा पूरे दिलो दिमाग में बह रहा था । 1 सितम्बर 1994 की पहली शाम खटीमा में 7 आन्दोलनकारियों को पुलिस द्वारा मार दिए जाने की बुरी खबर ने रातभर सोने नहीं दिया था । फिर सुबह 7 बजे खबर मिली कि राज्य निर्माण की मांग को लेकर मसूरी झूलाघर स्थित भवन में जो क्रमिक धरना चल रहा था, रात को पुलिस व पीएसी ने हमारे साथियों को उठाकर गायब कर दिया है और उलटा पुलिस पीएसी ने वहाॅ अपना डेरा डाल दिया । तब मैं निरंकारी भवन में निवास करता था। एक स्कूटी लेकर 8 बजे झूलाघर पंहुचा तो देखा वहाॅ उत्तराखण्ड संयुक्त संघर्ष समिति के अध्यक्ष हुकम सिंह पंवार जी के नेतृत्व में दर्जनों लोग धरना भवन (वर्तमान शहीद स्थल) के सम्मुख सड़क पर धरने पर इस मांग को लेकर बैठे हैं कि क्रमिक अनशन पर बैठे हमारे गिरफ्तार किए गए साथियों को छोड़ो और हमारा धरना स्थल खाली करो। श्रीमती इन्दिरा गांधी जी की मूर्ति के सामने ऊपरी सड़क पर मैंनें भी अपनी स्कूटी रोकी और और धरने की अग्रिम लाइन में बैठ कर नारे लगाने में शामिल हो गया । हम सभी को चारों और से हथियारबंद पुलिस एवं पीएसी के जवानों ने घेरा हुआ था । माहौल बहुत गरम हो चुका था । हालाॅकि उस दिन मसूरी के गरम दल के सैकड़ों यूवा नेता और छात्र राज्य आन्दोलन की रैली में पौड़ी चले गए थे, नहीं तो माहौल बहुत कुछ अलग ही होता । और 2 सितम्बर 1994 की कहानी भी संभवतः कुछ और होती ।
सुबह 9ः30 के आसपास अचानक पुलिस के दो बड़े बड़े ट्रक वहाॅ पंहुचते हैं और लाठियां भांजते हुए जबरन आन्दोलनकारियों को पकड़ कर ट्रक में ढूंसना शूरू हो जाता है । आन्दोलनकारी जोश के साथ जय उत्तराखण्ड कहते हुए अपनी गिरफ्तारी देते हैं । समिति अध्यक्ष हुकम सिंह पंवार, नगर पालिका अध्यक्ष जोत सिंह गुनसोला, हिन्दु जागरण मंच के राधेश्याम तायल, जय प्रकाश उत्तराखण्डी, कमल भण्डारी, देवी गोदियाल, मजदूर नेता देवेन्द्र भट्ट, विरेन्द्र कुमांई, मैं (प्रदीप भण्डारी) समेत करीब 60 से अधिक लोग गिरफ्तार होते हैं । उन्हें किताबघर की तरफ से किंके्रग लाया गया । किंके्रग पर जहाॅ लोगों ने सड़क पर लोहे के पाइप एवं पानी की टंकी आदि लगाकर पुलिस के ट्रक रोक दिए। जनता और पुलिस के बीच परस्पर काफी गहमागहमी हुई । इस दौरान मेरे बड़े भाई आदि वरिष्ठ आन्दोलनकारियों ने हमें किंग्रेग से आगे न आने के लिए जबरन ट्रक से वहीं उतार दिया।
उधर बारकैंची मार्ग से भी सेकड़ों लोग किंके्रग की तरफ आ धमके और ऊपर से पुलिस के खिलाफ नारेबाजी करने लगे। कुछ अंजान लोग पत्थरबाजी भी कर रहे थे । हम कुछ आन्दोलनकारी और तत्कालीन सीओ उमाकांत त्रिपाठी किसी तरह कालेज के दीवार की आड़ लेकर पत्थरों से बचे। श्री त्रिपाठी पत्थरबाजी न करने का अनुरोध कर रहे थे। इस बीच पुलिस वहाॅ से दोनों ट्रक निकालनें में सफल हो गई । ऊपर से लोगों का हल्ला तथा पत्थर बाजी तो कम हुई मगर हमारे सिर पर सवार जुनून कम नहीं हुआ और मैं अनेक साथियों समेत किंक्रेग से लंढ़ौर के लिए निकल पड़े । लंढ़ौर में दुकान से मैंनेे अपने मसूरी टाइम्स के सहयोगी (मैं उन दिनों मसूरी टाइम्स में लिखता भी था) के प्रेस फोटो वेन संचालक सरदार जीडी (गुरूचरण सिंह) की मारूति वेन में लाउडस्पीकर फिट किया और विशाल जुलूस के साथ झूलाघर के लिए नारे लगाते हुए निकल पड़े । मुझे याद है मेरे साथ जुलूस का नेतृत्व सक्रिय आन्दोलनकारी द्विजेन्द्र बुहगुणा भी कर रहे थे और भी बहुत लोग थे पर अब याद नहीं है । रियाल्टो सिनेमा के पास आते आते हमारे साथ जुलूस में स्त्री पुरूषों की संख्या सैकड़ों में हो गई। मगर जैसे ही हम झूलाघर पंहचे करीब 400 से अधिक बंदूक व लाठी से मोर्चा संभालें पुलिस और पीएससी के जवानों ने आगे आगे चल रहे हमें गाड़ी समेत घेर लिया । गाड़ी कैमरा जब्त कर दिया गया और एसडीएम बद्रीप्रसाद जसोला के कहने पर मुझे 3 अन्य साथियों को गिरफ्तार कर दिया गया । मेरे साथ गिरफ्तार दो साथी तो किसी तरह पुलिस से हाथ छुड़ाकर भाग गए मगर मैं और मेरे साथ 17 साल का लंढ़ौर निवासी एक नाबालिक सिद्वार्थ राणा को पुलिस ने थाने के पुराने लाॅकअप में कैद कर दिया । जय उत्तराखण्ड के नारे लगाते हुए हमें जब लाॅकअप में अंदर ढ़ूंसा गया तो हमने देखा हमसे पहले वहाॅ नगर पालिका के वरिष्ठ कर्मचारी नेता राजेन्द्र शर्मा तथा एक अन्य को पुलिस ने पहले से ही लाॅकअप में बंद किया हुआ था । मुझे अच्छी तरह याद है कि स्वः राजेन्द्र शर्मा जी ने पुलिस से हमें लेकर यह विरोध किया था कि इन बच्चों को क्यों बंद कर रहे हो, इन्हें छोड़ दो। खैर उनकी या हमारी कौन सुनने वाला था । हम भी लाॅकअप में बंद कर दिए गए ।
मगर हमारे बंद होने के बाद बाहर शहीद स्थल पर क्या हुआ उसे आज सारा संसार जानता है । झूलाघर पर हमारी भी गिरफ्तारी ने साथ के अन्य आन्दोनकारियों को इतना अधिक आक्रोशित कर दिया कि पुलिस से लोहा लेते हुए तमाम माता बहिनें और सभी भाई धरना स्थल हाॅल में घुस गए और पुलिस उत्पीडन के खिलाफ नारे बाजी करने लगे। फिर क्या था, तत्कालीन पुलिस प्रशासन ने मसूरी के इतिहास में वह काला पन्ना जड़ दिया । जिस पन्ने पर हमेशा के लिए अंकित हो गया कि राज्य निर्माण की मांगकर रहे निहत्थे आन्दोलनकारियों पर पुलिस ने बर्बरता से गोली चलाकर 6 लोगों को मौत के घाट उतार दिया । गोतयों के बारूद से किसी का माथा तो किसी का सीना छलनी हो गया। मसूरी में शहीद होने वाले आन्दोलनकारियों में धनपत सिंह, बलबीर नेगी, राय सिंह बंगारी, मदन मोहन मंमगाई, हंसा धनाई तथा बेलमती चैहान हैं जबकि पुलिस सीओ उमाकांत त्रिपाठी भी इस घटना में मारे गए इस प्रकार मसूरी में कुल 7 लोग शहीद हुए । जबकि दर्जनों लोग घायल हुए । सैकड़ों को जेलों में ठूंस दिया गया । आगे क्या क्या हुआ किसी से नहीं छुपा ।
आज मसूरी में आन्दोलनकारियों की शहादत की 31वीं वर्षगाॅठ है । इस अवसर पर हम जहाॅ शहीदों को भावभीनी श्रद्वांजलि अर्पित करते हैं वहीं समस्त सम्मानित राज्य आन्दोलनकारियों को सल्यूट करते हैं जिनकी बदौलत यह राज्य बना । तथा इस अवसर पर कामना करते हैं कि यह राज्य भ्रष्टाचार, अपराध व गनतंत्र (बंदुक) न बनें बल्कि आन्दोलनकारियों के अरमानों का शांत एवं खुशहाल राज्य बनें।
